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हथकरघा क्षेत्र के सतत विकास के लिए नई प्रौद्योगिकियों का उचित उपयोग आवश्यक है: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु


नई दिल्ली: भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु आज नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह में शामिल हुईं और संत कबीर हथकरघा पुरस्कार तथा राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार 2025 प्रदान किए। इस अवसर पर भारत की समृद्ध और विविध हथकरघा बुनाई परंपराओं के सम्मान में चार स्मारक डाक टिकट भी जारी किए गए।

समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि हथकरघा सदियों से भारत की सभ्यता की विकास यात्रा का अभिन्न अंग रहा है। इसमें हमारे राष्ट्र की असाधारण विविधता दिखाई देती है और इसने हमारी क्षेत्रीय विशिष्टताओं को संरक्षित भी किया है। हथकरघा क्षेत्र से रोजगार, महिला सशक्तीकरण, कला-संस्कृति और प्रकृति-प्रेम को बढ़ावा मिलता है। हथकरघा भारत के स्वतंत्रता संग्राम और आत्मनिर्भरता से भी जुड़ा रहा है।


राष्ट्रपति ने कहा कि स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत 7 अगस्त 1905 को हुई थी। बंगाल विभाजन के विरोध में शुरू हुए इस आंदोलन का उद्देश्य स्वदेशी वस्तुओं, स्वदेशी उद्योगों और विशेष रूप से देश के हथकरघा बुनकरों को प्रोत्साहन देना था। इसी ऐतिहासिक घटना के सम्मान में भारत सरकार वर्ष 2015 से, 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में मनाती आ रही है। उन्होंने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर हथकरघा क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह आयोजन हमारे देश की विविधता का उत्सव है जो हमारी सांस्कृतिक एकात्मता को परिलक्षित करता है। यह सरकार और बुनकर समाज के उन साझे प्रयासों को याद करने का अवसर है जो भारत के हथकरघा क्षेत्र की एक प्रीमियम क्वालिटी छवि बना रहे हैं।
आगे उन्होंने यह भी कहा कि हमारे हथकरघा क्षेत्र की, भारत की ग्रामीण प्रीमियम अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख, मानव-केंद्रित उदाहरण बनने की संभावनाएं बहुत बलवती हुई हैं। महत्वपूर्ण हथकरघा क्लस्टरों को आधुनिक प्रौद्योगिकी और आधुनिक प्रशिक्षण विधियों से जोड़ा जा रहा है। सरकार बुनकरों की आय बढ़ाने के लिए अनेक कदम उठा रही है। उन्होंने यह जानकर प्रशंसा व्यक्त की कि सरकार के प्रयासों से भारतीय हथकरघा क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय छवि निखर रही है और यह क्षेत्र एक ‘प्रमाणित सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था’ में परिवर्तित हो रहा है।
राष्ट्रपति ने कहा कि इस क्षेत्र के सतत विकास के लिए नई प्रौद्योगिकी का उचित उपयोग आवश्यक है। आधुनिक डिजिटल समाधानों के माध्यम से बाजार तक पहुंच को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इसके अलावा, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारतीय हथकरघा उत्पादों की पहुंच वैश्विक बाजारों तक और अधिक सशक्त बनाई जा सकती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि हथकरघा क्षेत्र देश के समावेशी विकास और आत्मनिर्भरता का सशक्त आधार बनेगा।
बताए चलें कि संत कबीर हथकरघा पुरस्कार हथकरघा बुनकरों को प्रदान किया जाने वाला देश का सर्वोच्च सम्मान है, जो उनकी उत्कृष्ट कारीगरी, हथकरघा के प्रति समर्पित जीवन और भारत की बुनाई परंपराओं को बनाए रखने और संवर्धन करने के लिए उनके निरंतर योगदान को सम्मानित करने के लिए प्रदान किया जाता है। राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार उन हथकरघा बुनकरों और अन्य हितधारकों को सम्मानित करने के लिए प्रदान किया जाता है जिन्होंने पारंपरिक कौशलों का संरक्षण करने और आधुनिक तकनीकों को अपनाने के साथ असाधारण रचनात्मकता, गुणवत्ता, नवीनता और उत्कृष्टता का प्रदर्शन किया है।



