Home एजुकेशन मेहर चंद कॉलेज के प्रिंसिपल ने पंजाब के CM मान एवं शिक्षा मंत्री को लिखा पत्र, जानें वजह…

मेहर चंद कॉलेज के प्रिंसिपल ने पंजाब के CM मान एवं शिक्षा मंत्री को लिखा पत्र, जानें वजह…

by Doaba News Line

दोआबा न्यूज़लाइन

कहा – पंजाब के बचे हुए 3 सरकारी सहायता प्राप्त पॉलिटेक्निक कॉलेजों की ली जाए सुध

जालंधर: शहर के मेहर चंद पॉलिटेक्निक कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ जगरूप सिंह ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस को एक पत्र लिखा है। पत्र में डॉ. जगरूप सिंह सीएम मान और शिक्षा मंत्री से पंजाब के बचे हुए 3 सरकारी सहायता प्राप्त पॉलिटेक्निक कॉलेजों की सुध लेने की बात कही है। पत्र में उन्होंने चार सबसे पुराने एवं प्रतिष्ठित सरकारी सहायता प्राप्त पॉलिटेक्निक कॉलेज, जिनमें डी.ए.वी. ट्रस्ट का मेहर चंद पॉलिटेक्निक कॉलेज, जालंधर, ननकाना साहिब ट्रस्ट का गुरु नानक पॉलिटेक्निक कॉलेज, लुधियाना, रामगढ़िया एजुकेशनल काउंसिल का रामगढ़िया पॉलिटेक्निक कॉलेज, फगवाड़ा तथा थापर ट्रस्ट का थापर पॉलिटेक्निक कॉलेज, पटियाला शामिल हैं, वर्ष 1954 से सरकारी नीतियों एवं आदेशों के अनुसार संचालित हो रहे हैं, की बात की है।

उन्होंने पत्र में बताया कि इनमें से थापर पॉलिटेक्निक कॉलेज ने लंबे संघर्ष के बाद अपनी प्रबंधन समिति के निर्णय के अनुसार सरकारी अनुदान लेना बंद कर दिया तथा अपनी संबद्धता थापर यूनिवर्सिटी के साथ कर ली। अर्थात् अब पंजाब में केवल तीन सरकारी सहायता प्राप्त (एडेड) पॉलिटेक्निक कॉलेज ही शेष बचे हैं। किन्तु मेहर चंद जैसी संस्था को सरकारी अनुदान के बिना चलाना अत्यंत कठिन है, क्योंकि डी.ए.वी. प्रबंधन के भारत के 21 राज्यों में एक हजार से अधिक विद्यालय एवं महाविद्यालय हैं और उन सभी को स्वयं अनुदान देना अल्पसंख्यक डी.ए.वी. प्रबंधन के लिए संभव नहीं है, जबकि थापर ट्रस्ट के अधीन केवल एक-दो संस्थान ही हैं।

यह उल्लेखनीय है कि इन कॉलेजों के संचालन हेतु पंजाब सरकार द्वारा 95 प्रतिशत अनुदान प्रदान किया जाता है। ये सभी उच्च गुणवत्ता वाले तथा विद्यार्थियों की पहली पसंद रहे पॉलिटेक्निक कॉलेज हैं और लगभग सात दशकों से पंजाब के लोगों की सेवा कर रहे हैं। शैक्षणिक, खेल, सांस्कृतिक एवं अन्य गतिविधियों में भी इनका सदैव अग्रणी स्थान रहा है। इन कॉलेजों में विद्यार्थियों का प्लेसमेंट भी लगभग 100 प्रतिशत रहा है।

यह भी उल्लेखनीय है कि इन तीनों सरकारी सहायता प्राप्त पॉलिटेक्निक कॉलेजों में वर्ष 1999-2000 के बाद किसी भी नियमित स्टाफ की भर्ती नहीं हुई। इन 26 वर्षों में अनेक कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं तथा अनेक इस संसार से भी विदा हो चुके हैं। ये प्रतिष्ठित एवं गुणवत्तापूर्ण संस्थान पहले स्वीकृत 95 पदों (जिन पर प्रत्येक वर्ष एडहॉक आधार पर अध्यापक नियुक्त किए जाते थे) के स्थान पर अब मात्र 72 पदों के सहारे चल रहे हैं। ये केवल शिक्षण पद हैं। गैर-शिक्षण कर्मचारियों के कुछ सीमित पद भी न्यायालयों का सहारा लेने के बाद तथा लंबे संघर्ष के उपरांत वर्ष 2024-25 से ही प्राप्त हुए हैं।

विचारणीय बात यह है कि अब पूरे पंजाब में ऐसे केवल तीन ही पॉलिटेक्निक कॉलेज शेष हैं, जिनकी संख्या हाथ की उंगलियों से भी कम है। ये उस समय से संचालित हो रहे हैं जब उत्तर भारत में उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या बहुत कम थी। तकनीकी शिक्षा की मशाल लेकर ये कॉलेज पिछले सात दशकों से पंजाब के विद्यार्थियों की सेवा कर रहे हैं, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि स्टाफ की भारी कमी के कारण पिछले 25-26 वर्षों से बीमार चल रहे इन संस्थानों को अब शीघ्र ही अस्तित्व का संकट घेर लेगा। इन संस्थानों का हाथ थामने और इनमें नई ऊर्जा का संचार करने की आवश्यकता है। अनेक विषयों एवं पाठ्यक्रमों में केवल एडहॉक शिक्षक ही कार्यरत हैं। नियमित स्टाफ उपलब्ध न होने के कारण प्रयोगशालाओं का संचालन तथा अन्य नियमित प्रशासनिक एवं शैक्षणिक कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं।

यदि किसी संस्थान को एन.बी.ए. (NBA) से मान्यता (Accreditation) प्राप्त करनी हो, जिसे आजकल ए.आई.सी.टी.ई., नई दिल्ली द्वारा अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, तथा स्वयं को गुणवत्तापूर्ण संस्थानों की श्रेणी में बनाए रखना हो, तो केवल एडहॉक स्टाफ के आधार पर आवेदन करना संभव नहीं है। मेहर चंद पॉलिटेक्निक कॉलेज ने सीमित संसाधनों के बावजूद दो पाठ्यक्रमों में एन.बी.ए. मान्यता प्राप्त की है तथा राष्ट्रीय पुरस्कार भी अर्जित किया है। किन्तु पंजाब सरकार की केवल कामचलाऊ नीति तकनीकी शिक्षा के भविष्य के लिए किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। सरकार एक ओर नए सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज एवं आई.टी.आई. खोलने की घोषणाएँ कर रही है, जबकि दूसरी ओर सात दशकों से अधिक समय से तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर सेवा दे रहे ये तीन सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेज बंद होने की स्थिति में पहुँच रहे हैं। यह किसी भी प्रकार से तर्कसंगत नहीं है। इन कॉलेजों के कर्मचारियों को कई-कई महीनों तक वेतन नहीं मिल पाता। इन तीनों कॉलेजों का वार्षिक बजट भी मात्र तीन से चार करोड़ रुपये के बीच है।

डॉ जगरूप ने यह भी कहा कि आप दोनों पंजाब तथा शिक्षा जगत की आवाज़ हैं। इसलिए आपसे विनम्र एवं दृढ़ आग्रह है कि हमारे अधिकारों की रक्षा की जाए तथा पंजाब में गुणवत्तापूर्ण तकनीकी शिक्षा के भविष्य को ध्यान में रखते हुए इन कॉलेजों में नियमित स्टाफ की भर्ती की जाए, ताकि ये ऐतिहासिक संस्थान गुमनामी का शिकार न हो जाएँ। इन कॉलेजों से शिक्षित विद्यार्थी आज देश एवं पंजाब की अनेक महत्वपूर्ण सेवाओं एवं उच्च पदों पर कार्यरत हैं। अकेले मेहर चंद पॉलिटेक्निक कॉलेज, जालंधर से पिछले 72 वर्षों में 50,000 से अधिक विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर देश की सेवा कर चुके हैं।

आगे उन्होंने कहा कि तकनीकी शिक्षा के आकाश के ध्रुवतारे के समान स्थापित पंजाब के ये तीन शेष बचे पॉलिटेक्निक कॉलेज ऐसे संस्थान हैं जिनका वार्षिक बजट केवल कुछ करोड़ रुपये है, जो आपकी दूरदर्शी योजनाओं के व्यापक दायरे की तुलना में अत्यंत नगण्य है। इनमें 95 प्रतिशत अनुदान सरकार द्वारा तथा 5 प्रतिशत प्रबंधन द्वारा वहन किया जाता है। ये कॉलेज वर्षों से न्यायालयों के मामलों में उलझे हुए हैं। ये सदैव पंजाब सरकार की प्रतिष्ठा के प्रतीक रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि हमें किसी नए भवन या आधारभूत संरचना की आवश्यकता नहीं है, केवल स्टाफ की कमी को पूरा किया जाए तथा सरकारी अनुदान नियमित रूप से जारी किया जाए।

आगे प्रिंसिपल ने यह भी कहा कि अगर ऐसा ही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब आने वाले तीन-चार वर्षों में इन प्रतिष्ठित कॉलेजों में एक भी नियमित कर्मचारी शेष नहीं रहेगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर ऐसे शीर्ष संस्थानों की रक्षा की जाए, ताकि पंजाब तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में अन्य राज्यों से पीछे न रह जाए। वर्ष 2024-25 में मेहर चंद पॉलिटेक्निक कॉलेज को केंद्रीय संस्था निट्टर (NITTTR) द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्रदान किया गया है। पूरे भारत के तीन सर्वश्रेष्ठ पॉलिटेक्निक कॉलेजों में इसका चयन हुआ, जिनमें अन्य दोनों संस्थान दक्षिण भारत के हैं। यह पंजाब के लिए अत्यंत गौरव की बात है। इस कठिन समय में इन कॉलेजों की रक्षा करना आपका नैतिक दायित्व भी है और हमारा मूल अधिकार भी। इन संस्थानों को जीवित बनाए रखने के लिए बार-बार न्यायालयों की शरण लेनी पड़ रही है।

अंत में डॉ जगरूप सिंह ने कहा कि आशा है कि आप मेरी इस विनम्र प्रार्थना को स्वीकार करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश देंगे कि इन कॉलेजों में संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) के स्थान पर नियमित पद स्वीकृत किए जाएँ, सेवानिवृत्त कर्मचारियों के स्थान पर समय की आवश्यकता के अनुसार नई नियुक्तियाँ की जाएँ तथा लंबित अनुदान शीघ्र जारी किया जाए, ताकि ये कॉलेज पुनः अपनी पूर्व गरिमा प्राप्त कर सकें और तकनीकी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के माध्यम से पंजाब की सेवा पूरे समर्पण के साथ करते रहें।

 

 

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