




धर्म : दशहरा अथवा विजयदशमी का त्योहार हिन्दू धर्म में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन को लोग बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी मानते है। इस दिन कई स्थानों पर रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले जलाये जाते है। मान्यता यह भी है कि इस दिन शस्त्र-पूजा करते हैं और नया कार्य प्रारम्भ करते हैं। लोग हर्ष और उल्लास के साथ यह त्योहार को मनाते है। हर जगह मेले लगते है, और लोग दूर-दराज से इसे देखने के लिए पहुंचते है। इस दिन सुन्दर झाकियां बनाई जाती है, जिनमें एक तरफ श्री राम की सेना होती है तो दूसरी ओर लंकापति रावण की। दोनों तरफ युद्ध होता है। श्री राम की सेना की जीत के बाद रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता हैं।
आजकल के युग में इस दिन युवा और बच्चे पटाखे चलाते है, और खूब इंजॉय करते है। मेले में लोग पहुंचकर जलेबी और कई तरहों के व्यजनों का लुफ्त उठाते हैं। परिवार मिलजुल कर इस दिन का जश्न मनाते हैं, इसी के साथ यह दिन एकता को भी समर्पित हैं। एकता के साथ हम हर लड़ाई पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।




गौरतलब है कि दशहरा से पहले ही स्थान-स्थान पर रामलीला का आयोजन किया जाता है, जिसमें पूरी रामायण को भागों में दिखाया जाता है।
व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।
पौराणिक लोक कथाओं में इस दिन का वर्णन
पौराणिक लोक कथाओं की अगर बात करें तो इस दिन भगवान राम ने रावण से युद्ध की शुरुआत की थी। और देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। इस दिन को जीत का प्रतीक भी माना जाता है। युद्ध से पहले भगवान राम ने शक्ति प्राप्ति के लिए नौ दिनों तक माँ चंडी (दुर्गा) की आराधना और ‘शक्ति पूजा’ की थी। इस विजय के बाद बुराई के प्रतीक रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं।





