जालंधर का प्रसिद्ध श्री सिद्ध सोडल बाबा मेला 25 सितंबर को, जानें पौराणिक मान्यता और ऐतिहासिक महत्व

दोआबा न्यूज़लाइन

जालंधर: पंजाब के जालंधर का सबसे बड़ा प्रसिद्ध श्री सिद्ध बाबा सोढल मेला इस बार 25 सितंबर दिन शुक्रवार को है। हालांकि यह मेला श्री सिद्ध सोडल मंदिर में मेले वाले दिन से 2-3 दिन पहले और बाद तक चलता है। जालंधर शहर सहित देश- विदेश से लोग इस मेले में बाबा सोडल का आशीर्वाद लेने यहां पहुंचते हैं। जानकारी के अनुसार यह मेला हर साल भादों महीने में शुक्ल पक्ष के 14वें दिन लगाया जाता है। इस मेले में हजारों की तादाद में लोग पहुंचते हैं और बाबा के सामने अपनी झोलियां फैलाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

बताया जाता है कि करीब 300 वर्ष पुराना यह मंदिर विश्व विख्यात भी है। कहा जाता है कि चड्ढा बिरादरी के जठेरे और आनंद बिरादरी के साथ इस मंदिर का इतिहास जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि यहां बेऔलाद लोगों की बाबा के आशीर्वाद से झोलियां भी भर जाती हैं। इसलिए हर साल यहां मेले में हजारों श्रद्धालु संतान प्राप्ति की मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। जिसके बाद मन्नत पूरी होने पर लोग बैंड बाजों के साथ अगले साल बच्चों को लेकर बाबा के दरबार में पहुंच कर अपनी हाजिरी लगाते हैं।

वहीं, सोढल मंदिर में एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक तालाब है जहां सोढल बाबा की विशाल प्रतिमा स्थापित है। बाबा सोडल की प्रतिमा को श्रद्धालु दूध से नहलाते हैं और पवित्र सरोवर के दूध मिले जल से अपने ऊपर छिड़काव करते हैं और चरणामृत की तरह इस पवित्र जल को पीते हैं।

श्री सिद्ध बाब सोढल मेले की पौराणिक मान्यता

बताया जाता है कि सिद्ध बाब सोढल का जन्म जालंधर में चड्डा परिवार में हुआ था। इसके साथ कई कहानियां जुड़ी हुई हैं। एक पौराणिक कहानी के अनुसार जब सोढल बाबा बहुत छोटे थे, एक दिन वह अपनी माता के साथ तालाब पर गए। तालाब में माता कपड़े धोने में व्यस्त थीं और बाबा जी पास में ही खेल रहे थे। तालाब के नजदीक आने को लेकर माता ने बाबा को कई बार टोका और डांटा भी। जिस पर बाबा जी ने माता से कहा कि अगर आपने मेरी बात नहीं मानी तो मैं तालाब में कूद जाऊंगा, बाबा जी के बार- बार ऐसा बोलने और माता को काम करते हुए तंग करने पर माता ने गुस्से में खीजकर कहा जा गिर जा। ऐसा कहने पर बाबा सोढल ने माता के कहे अनुसार तालाब में छलांग लगा दी। माता ने जब ये देखा तो उन्होंने जोर- जोर से विलाप करना शुरू कर दिया। माता अपने आप को कोसने लग गई कि उसने अपने बेटे को गुस्से में ऐसा कैसे कह दिया। माता के काफी देर विलाप करने के बाद बाबा जी पवित्र नाग देवता के रूप में तालाब से प्रकट हुए और माता को दर्शन दिए।

इसके साथ ही उन्होंने चड्ढा और आनंद बिरादरी के परिवारों को उनके पुनर्जन्म को स्वीकार करते हुए मट्ठी जिसे टोपा कहा जाता है चढ़ाने का निर्देश दिया। इस टोपे का सेवन केवल चड्ढा और आनंद परिवार के सदस्य ही कर सकते हैं। कहा यह भी जाता है कि इस प्रसाद का सेवन परिवार में जन्मी बेटी तो कर सकती है मगर दामाद व उसके बच्चों के लिए यह वर्जित है।

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